आलेख : मधुप्रकाश लड्ढा, राजसमंद।
हैप्पी फादर्स डे… !!
शब्द अंग्रेजी के लेकिन हिंदी की तरह दिल को उस समय छू गए जब घर में घुसते ही बेटे – बेटियों ने अचानक से एक प्यारा और खुशबूदार उपहार हाथ पर रखते हुए बदन से लिपट गए।
लेकिन बाप हूं न! तो उनके सामने अपने आंखे भी गीली न कर सका। बेटे – बेटी नए जमाने के हैं लेकिन में बाप तो अपने पिता के जमाने का ही हूं।
मुझे याद है मेरा वो बचपन .. जब पिता से लिपटना तो दूर बिना बात उनके पास भी नहीं फटक सकते थे। वो जमाना अलग था, जहां न एक दिन के लिए फादर्स डे होता था न मदर्स डे। वहां तो हर दिन फादर और मदर का दिन ही होता था। कितने खूबसूरत दिन थे..
न दुनियां का ग़म था
न रिश्तों के बंधन
बड़ी खूबसूरत थी
वो जिंदगानी
ऐसा नहीं कि वो हमे प्यार नहीं करते थे, प्यार तो खूब करते थे। आज के पिता से भी ज्यादा लेकिन अनुशासन की रस्सी भी साथ रखते थे। अप्रत्याशित रूप से कभी – कभी बांध भी देते थे। लेकिन मजाल जो दिल के किसी कोने से उनके लिए कोई शिकायत तो निकल जाए। काश: वो आज पास होते तो देखते की जमाना कितना बदल गया है।
प्रगति और भौतिक सुख की चाह ने रिश्तों को भी दिनों में बांट दिया है। वो जमाना हवा हो गया जब मां – बाप ही जिंदगी का सर्वस्व हुआ करते थे। मुझे तो याद नहीं कि उनके बिना मेरा कोई सपना भी था। मेरे सपने सिर्फ उनकी जिंदगी के इर्द गिर्द ही घुमा करते थे।
न कुछ बनने की इच्छा न कुछ पाने के चाहत। जैसा उन्होंने चाहा वही जिंदगी का उद्देश्य बन गया। जिंदगी का एक मात्र लक्ष्य यही था कि मेरी वजह से कभी उनकी आंख से आंसू न टपके और इस लक्ष्य को पाने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी। आज वो इस संसार मे नहीं है लेकिन उनकी स्मृतियां दिन रात आंखों के सामने घूमती है। हर वस्तु के मायने बदल गए, पैमाने बदल गए लेकिन नहीं बदले हैं तो मेरी पीढ़ी के दस्तूर, मेरी पीढ़ी के संस्कार.. वो आज भी अनवरत है और अनंत में विलीन होने तक साथ ही रहेंगे।