अमेरिका और ईरान के बीच संभावित सैन्य टकराव को लेकर अमेरिकी सत्ता के शीर्ष स्तर पर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम, व्हाइट हाउस के करीबी सलाहकारों और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच रणनीति को लेकर गहन चर्चा चल रही है। सवाल यह है कि क्या ईरान पर बड़ा सैन्य हमला अमेरिका को एक लंबी और जटिल जंग में धकेल सकता है?
अमेरिकी जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने राष्ट्रपति और उनकी टीम को आगाह किया है कि ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य कार्रवाई किसी सीमित ऑपरेशन जैसी नहीं होगी। उनके मुताबिक, यह कदम क्षेत्रीय स्तर पर बड़े संघर्ष का रूप ले सकता है। केन ने बैठकों में स्पष्ट किया कि ईरान पर हमला वेनेजुएला जैसे अभियानों से बिल्कुल अलग और अधिक जोखिम भरा होगा। बड़े पैमाने पर गोला-बारूद और हथियारों के इस्तेमाल से भविष्य में चीन के साथ संभावित टकराव की स्थिति में अमेरिकी सेना की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
जनरल केन का आकलन है कि यदि हमला शुरू होता है तो वह सीमित दायरे में नहीं रहेगा। ईरान अपने सहयोगी समूहों के जरिए मध्य पूर्व में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकता है, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी और हजारों अमेरिकी सैनिक खतरे में पड़ सकते हैं। हालांकि, केन ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे राष्ट्रपति के अंतिम निर्णय का पालन करेंगे।
दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन के भीतर कूटनीति को प्राथमिकता देने की भी आवाजें उठ रही हैं। ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ का मानना है कि जिनेवा में प्रस्तावित वार्ता को पूरा अवसर दिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि जल्दबाजी में सैन्य कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय दबाव कमजोर हो सकता है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी संभावित युद्ध के परिणामों पर चिंता जताई है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने इन रिपोर्टों को “फेक न्यूज” बताते हुए कहा कि अमेरिका किसी भी जंग को जीतने में सक्षम है। उन्होंने दोहराया कि अंतिम फैसला उन्हीं के हाथ में है और देश की रणनीति वही तय करेंगे।
कुल मिलाकर, अमेरिका के भीतर ईरान नीति को लेकर स्पष्ट विभाजन नजर आ रहा है—एक पक्ष सैन्य जोखिमों को लेकर सतर्क है, तो दूसरा कूटनीतिक समाधान की वकालत कर रहा है। अब दुनिया की नजर वॉशिंगटन के अगले कदम पर टिकी है।
— नितिन सिंह | 24 फरवरी 2026
