January 14, 2026
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हैदराबाद।कभी-कभी ज़िंदगी की सादगी और जिम्मेदारी ऐसी मिसाल पेश कर जाती है, जो समाज को सोचने पर मजबूर कर देती है। तेलंगाना के संगारेड्डी जिले के लक्ष्मीपुरम गांव से सामने आई यह खबर भी कुछ ऐसी ही है। यहां 80 वर्षीय बुजुर्ग नक्का इंद्रय्या ने अपने जीवनकाल में ही अपनी कब्र खोदकर न सिर्फ अपने बच्चों को अंतिम संस्कार के बोझ से मुक्त किया, बल्कि समाज के लिए एक गहरी सीख भी छोड़ गए।
जानकारी के अनुसार, नक्का इंद्रय्या का 11 जनवरी को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, उन्हें उसी कब्र में दफनाया गया, जिसे उन्होंने अपने जीते-जी स्वयं तैयार किया था। खास बात यह है कि यह कब्र उनकी दिवंगत पत्नी की कब्र के ठीक बगल में थी। इंद्रय्या इस स्थान को प्यार से “आखिरी आरामगाह” कहा करते थे।
परिवार और गांववालों के मुताबिक, इंद्रय्या का मानना था कि मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार और उससे जुड़ी व्यवस्थाएं बच्चों के लिए भावनात्मक ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बोझ बन जाती हैं। इसी सोच के चलते उन्होंने पहले ही अपनी कब्र खुदवा ली थी, ताकि उनके जाने के बाद बच्चों पर कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी न आए।
इंद्रय्या के भाई ने मीडिया को बताया कि वे बेहद सादगीपूर्ण, अनुशासित और सेवा भाव से भरा जीवन जीते थे। उनका पूरा जीवन दूसरों की मदद और गांव के विकास को समर्पित रहा। उन्होंने न सिर्फ अपनी कब्र खुद तैयार की, बल्कि गांव में चर्च निर्माण में भी अहम योगदान दिया। इसके अलावा गांव में घर, स्कूल और धार्मिक स्थलों के निर्माण में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही।
परिवार ने बताया कि इंद्रय्या ने अपने जीवनकाल में ही अपनी पूरी संपत्ति अपने चार बच्चों में बांट दी थी। उन्होंने बच्चों के लिए घर बनवाए, ताकि भविष्य में किसी तरह का विवाद न हो। इतना ही नहीं, परिवार में कुल नौ शादियां भी उन्होंने स्वयं करवाईं, जिससे उनके बाद किसी पर सामाजिक या आर्थिक जिम्मेदारी न आए।
खुद अपनी कब्र खोदने वाले इस बुजुर्ग के अंतिम संस्कार के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। पूरे गांव में शोक के साथ-साथ सम्मान और गर्व का माहौल देखने को मिला। लोगों की आंखें नम थीं, लेकिन मन में इंद्रय्या के जीवन को लेकर गहरी श्रद्धा भी थी।
ग्रामीणों का कहना है कि नक्का इंद्रय्या सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार थे। उन्होंने यह साबित कर दिया कि जीवन को अगर जिम्मेदारी, सेवा और संतोष के साथ जिया जाए, तो मृत्यु भी दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकती है। आज लक्ष्मीपुरम गांव उन्हें एक ऐसे इंसान के रूप में याद कर रहा है, जिन्होंने अपने आखिरी फैसले से भी अपने बच्चों और समाज का भला किया।
नितिन | वीबीटी न्यूज
दिनांक: 12 जनवरी 2026

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