March 2, 2026
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संवाददाता/मुरलीधर पारीक /नागौर(कोड):
श्री रूप रजत गौशाला में जारी ‘धेनुमानस गौ कथा’ के द्वितीय दिवस की कथा अत्यंत भावपूर्ण और प्रेरणादायक रही। परम पूज्य कथावाचक कौशिक जी महाराज ने गौ-भक्ति, धर्मपरायणता, त्याग और न्याय के दो विशेष प्रसंगों को इतना हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया कि पूरा पांडाल भावविभोर हो उठा। कथा स्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा, और वातावरण ‘जय गौ माता’ के जयकारों से गूंजता रहा।


राजा दिलीप व रानी सुदक्षिणा: गौ-सेवा की सर्वोच्च साधना

महाराज कौशिक जी ने कथा का आरंभ राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा की कथा को आगे बढ़ाते हुए किया। उन्होंने बताया कि जब राजा दिलीप निःसंतान थे, तब उन्होंने गुरु वशिष्ठ की शरण ली और संतान प्राप्ति के उपाय पूछे।

गुरु वशिष्ठ ने राजा को आदेश दिया कि वे अपने राजसी सुख-साधन छोड़कर कामधेनु की पुत्री नन्दिनी गौमाता की सेवा करें। यह सेवा केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि एक कठोर व्रत के समान थी, जिसमें त्याग, समर्पण और निःस्वार्थ भावना सर्वोपरि थी।

महाराज ने अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में कहा—

“गौ-सेवा केवल पुण्य का कार्य नहीं, बल्कि मानव जीवन को सफल और सिद्ध बनाने का सर्वोच्च धर्म है।”

राजा दिलीप ने दिन-रात गौमाता की सुरक्षा और सेवा में स्वयं को तन-मन-धन से लगा दिया। उनकी सच्ची निष्ठा से प्रसन्न होकर गौमाता ने राजा को आशीर्वाद दिया, और बाद में उन्हें वंश वृद्धि का सुख प्राप्त हुआ।

यह प्रसंग उपस्थित श्रोताओं को यह संदेश दे गया कि जो व्यक्ति गौ-सेवा करता है, उसके जीवन से संकट दूर रहते हैं और सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं।


देवी अहिल्याबाई होल्कर: न्याय की प्रतिमूर्ति

दूसरा मुख्य प्रसंग महाराज ने देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन से लिया—जो भारतीय इतिहास में निष्पक्ष न्याय का अनुपम उदाहरण है।

उन्होंने बताया कि एक बार अहिल्याबाई के पुत्र मालेराव होल्कर के रथ से एक गौ-बछड़े की आकस्मिक मृत्यु हो गई। जब गौमाता न्याय मांगने दरबार में पहुँचीं और इसे देखा, तो अहिल्याबाई अत्यंत दुखी हुईं।

परंतु न्याय करते समय उन्होंने पुत्र-मोह को भी त्याग दिया और निर्णय सुनाया—

“जिस रथ के नीचे गौ-बछड़ा आया, उसी रथ के नीचे मालेराव को दंडस्वरूप आना होगा।”

उनका यह फैसला सुनकर पूरा दरबार स्तब्ध रह गया। न्याय के प्रति इतनी दृढ़ता कम ही देखने को मिलती है।


गौमाता का करुणा-भाव: दंड से पहले मिला क्षमादान

जब मालेराव को दंड देने की तैयारी हो गई और वे रथ के नीचे आने को बढ़े, तभी गौमाता स्वयं दौड़कर रथ के सामने आ खड़ी हुईं। मानो वह कह रही हों कि—

“जिसने मुझे कष्ट नहीं पहुँचाना चाहा, उसे मैं दंडित नहीं होने दूँगी।”

यह दृश्य अत्यंत भावुक था। गौमाता के इस क्षमादान ने दंड को करुणा में बदल दिया और अहिल्याबाई का निर्णय इतिहास में अमर हो गया।

महाराज कौशिक जी ने कहा—

“न्याय वह है जो निष्पक्ष हो। और जब उसमें दया का संयोग होता है, तब वह धर्म का वास्तविक स्वरूप बन जाता है।”


कथा के अंत में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

कथा समाप्ति पर श्रद्धालुओं में अद्भुत ऊर्जा और भक्ति का संचार हुआ। गौशाला परिसर में भक्ति का वातावरण इतना प्रभावशाली था कि लोगों की आँखें प्रसंग सुनकर नम हो गईं। महाराज ने सभी को गौ-सेवा, धर्म और सदाचार का पालन करने का संदेश दिया।

एडिटर/नितिन सिंह/वीबीटी न्यूज /18 नवंबर 2025

 

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