भारत विविधताओं का देश है, जहां हर पर्व अपनी अनोखी छवि के साथ मनाया जाता है। इन्हीं पर्वों में से एक है गणेश चतुर्थी, जिसे विघ्नहर्ता श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को शुरू होकर यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी को गणपति विसर्जन के साथ सम्पन्न होता है।
आस्था और श्रद्धा का प्रतीक
गणेश जी को बुद्धि, ज्ञान और सफलता का देवता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश पूजन से करने की परंपरा है। मान्यता है कि गणपति बप्पा का पूजन करने से सभी विघ्न दूर होते हैं और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है। गणेश चतुर्थी के दौरान भक्त घरों और पंडालों में गणेश की प्रतिमा स्थापित कर बड़ी श्रद्धा और भक्ति भाव से पूजन-अर्चन करते हैं।
उत्सव की भव्यता
गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। महाराष्ट्र में इस त्योहार का उत्साह देखते ही बनता है। मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहरों में विशाल पंडाल सजाए जाते हैं, जहां लाखों लोग “गणपति बप्पा मोरया” के जयकारों के साथ दर्शन करने आते हैं। वहीं देशभर के अन्य राज्यों में भी यह पर्व अब बड़े धूमधाम से मनाया जाने लगा है।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
पहले घर-घर मिट्टी की छोटी प्रतिमाएं लाई जाती थीं, लेकिन अब पर्यावरण के प्रति जागरूकता को देखते हुए इको-फ्रेंडली गणेश मूर्तियों का चलन बढ़ गया है। इसके साथ ही पंडालों में थीम आधारित सजावट, डिजिटल आरती और लाइव दर्शन जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं भी की जाती हैं। सोशल मीडिया पर भी गणेशोत्सव की झलक खूब साझा की जाती है, जिससे यह पर्व और भी व्यापक रूप ले चुका है।
भोग और प्रसाद की मिठास
गणेश चतुर्थी का जिक्र हो और मोदक का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। मान्यता है कि मोदक गणेश जी का प्रिय भोजन है। इसलिए भक्त विशेष रूप से मोदक, लड्डू और विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर गणपति को अर्पित करते हैं और प्रसाद के रूप में वितरित करते हैं।
विसर्जन का भावुक पल
दस दिनों तक उत्साह, पूजा और भक्ति के बाद जब अनंत चतुर्दशी को गणेश विसर्जन होता है, तो वातावरण भावुक हो जाता है। “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” के जयकारों के साथ भक्त गणपति को विदा करते हैं। यह परंपरा हमें त्याग, पुनर्मिलन और जीवन के चक्र की याद दिलाती है।
गणेश चतुर्थी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत तस्वीर है। यह उत्सव हमें एकता, श्रद्धा और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देता है। सचमुच, गणपति बप्पा का यह पर्व हर दिल में नई ऊर्जा और सकारात्मकता भर देता है।