जायल/नागौर। राजस्थान की सांस्कृतिक परंपराओं में मायरा एक विशेष स्थान रखता है। यह केवल उपहार नहीं, बल्कि रिश्तों की मजबूती, प्रेम और सामाजिक सम्मान का प्रतीक माना जाता है। हाल ही में नागौर जिले की जायल तहसील से एक ऐसा ही ऐतिहासिक मायरा सामने आया है, जिसने पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना दिया है। यहां दो ब्राह्मण भाइयों ने मिलकर अपनी बहन के बेटे की शादी में करीब 1 करोड़ 81 लाख रुपये का भव्य मायरा भरकर समाज में नई मिसाल कायम की है।

🔷 मायरे की परंपरा और उसका महत्व
राजस्थान में जब किसी परिवार में विवाह होता है, तो मामा द्वारा अपने भांजा या भांजी को दिए जाने वाले विशेष उपहार को मायरा कहा जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे रिश्तों की गहराई का प्रतीक माना जाता है।
मायरे के दौरान घर की महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं, जिन्हें जायल खिंयाला मायरा गीत के नाम से जाना जाता है। ये गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति और इतिहास को भी जीवंत रखते हैं।
जायल क्षेत्र का मायरा पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है। यहां भरे जाने वाले मायरे अक्सर बड़े स्तर के होते हैं, जिनकी चर्चा दूर-दूर तक होती है।
🔷 ब्राह्मण भाइयों का ऐतिहासिक कदम
जायल निवासी ललित व्यास और ओमप्रकाश व्यास ने अपनी बहन गायत्री के पुत्र निलेश के विवाह अवसर पर भव्य मायरा भरा। इस मायरे की कुल राशि लगभग 1 करोड़ 81 लाख रुपये बताई जा रही है, जिसमें शामिल हैं—
लगभग 81 लाख रुपये नकद
करीब 25 तोला सोना
चांदी के आभूषण
कीमती घरेलू सामान
अन्य उपयोगी वस्तुएं
इतनी बड़ी राशि और बहुमूल्य उपहारों से भरा यह मायरा ब्राह्मण समाज के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा मायरा माना जा रहा है।
🔷 जायल का नाम फिर हुआ रोशन
अब तक नागौर जिले में विशेष रूप से जाट समाज के मायरे प्रदेशभर में प्रसिद्ध रहे हैं। जायल के जाट परिवारों द्वारा भरे गए करोड़ों रुपये के मायरे पहले भी सुर्खियों में रहे हैं।
लेकिन इस बार ब्राह्मण समाज के भाइयों द्वारा भरे गए मायरे ने यह साबित कर दिया कि सामाजिक परंपराओं को निभाने में हर समाज आगे है। इस आयोजन ने जायल का नाम एक बार फिर पूरे राजस्थान में रोशन कर दिया है।
🔷 सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश
यह मायरा केवल धन-संपत्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज में भाईचारे, प्रेम और जिम्मेदारी का उदाहरण भी है। ललित व्यास और ओमप्रकाश व्यास ने यह साबित किया कि बहन के प्रति सम्मान और स्नेह का कोई मूल्य नहीं होता।
ग्रामीणों और समाज के लोगों का कहना है कि ऐसे आयोजन आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य करते हैं। इससे पारिवारिक रिश्ते मजबूत होते हैं और समाज में सकारात्मक संदेश जाता है।
🔷 नागौर जिले में पहले भी भरे गए भव्य मायरे
यदि पिछले तीन वर्षों की बात करें तो नागौर जिले में करीब 6 से 7 बड़े मायरे भरे जा चुके हैं। इनमें शामिल हैं—
करोड़ों रुपये की जमीन
लाखों रुपये नकद
भारी मात्रा में सोना-चांदी
वाहन और अन्य कीमती वस्तुएं
इन मायरे भरने वाले परिवारों ने न केवल अपने समाज में बल्कि पूरे जिले में सम्मान प्राप्त किया है। इनके कारण नागौर को “मायरे की धरती” भी कहा जाने लगा है।
🔷 महिलाओं की भूमिका और सांस्कृतिक रंग
मायरा आयोजन के दौरान महिलाओं की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। इस अवसर पर महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजकर विशेष गीत गाती हैं। ये गीत मायरे के इतिहास, पारिवारिक संबंधों और समाज की परंपराओं को दर्शाते हैं।
जायल क्षेत्र में गाए जाने वाले ये गीत आज भी युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। इस आयोजन में भी महिलाओं ने पूरे उत्साह के साथ परंपरागत गीतों की प्रस्तुति दी, जिससे माहौल पूरी तरह सांस्कृतिक रंग में रंग गया।
🔷 समाज में बढ़ती जागरूकता और बदलता स्वरूप
समय के साथ मायरे का स्वरूप भी बदल रहा है। पहले जहां सीमित उपहार दिए जाते थे, वहीं अब लोग शिक्षा, व्यवसाय और आर्थिक मजबूती के साथ बड़े स्तर पर मायरा भर रहे हैं।
हालांकि समाज के कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मायरा दिखावे का माध्यम नहीं बनना चाहिए, बल्कि इसे प्रेम और संस्कार का प्रतीक बनाए रखना चाहिए। फिर भी, ऐसे आयोजन समाज की आर्थिक प्रगति और सामाजिक मजबूती को भी दर्शाते हैं।
🔷 युवाओं के लिए प्रेरणा
ललित व्यास और ओमप्रकाश व्यास द्वारा भरा गया यह मायरा युवाओं के लिए भी प्रेरणा है। यह दिखाता है कि परिवार और रिश्तों को प्राथमिकता देना आज के समय में भी उतना ही जरूरी है, जितना पहले था।
आज जब लोग व्यस्त जीवनशैली में रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे आयोजन रिश्तों की अहमियत को फिर से उजागर करते हैं।
जायल में भरा गया यह 1.81 करोड़ का मायरा केवल एक पारिवारिक आयोजन नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवंत संस्कृति, सामाजिक एकता और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है। ब्राह्मण भाइयों द्वारा भरा गया यह मायरा इतिहास में दर्ज हो गया है और आने वाले समय में भी इसकी चर्चा होती रहेगी।
इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि जायल की धरती आज भी अपनी परंपराओं, संस्कृति और रिश्तों की मजबूती के लिए पूरे प्रदेश में एक अलग पहचान रखती है।
– नितिन सिंह/वीबीटी न्यूज
