संवाददाता/विशनाराम
नागौर जिले के रियांबड़ी क्षेत्र के लूणी नदी में निरंतर बहाव का सकारात्मक असर अब केवल नदी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके जल का लाभ 10 से 25 किलोमीटर दूर स्थित गांवों तक दिखाई देने लगा है। नदी के बहाव क्षेत्र से दूर बसे इलाकों में भी कुओं का जलस्तर तेजी से बढ़ा है, जिससे लाखों किसानों को बड़ी राहत मिली है। इसी जल उपलब्धता का परिणाम है कि रिया बड़ी क्षेत्र में इस बार खेती के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

रिया बड़ी क्षेत्र में इस सीजन कई किसान आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर सब्जियों की खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि इनमें से अधिकांश किसान उत्तर प्रदेश से आए हैं, जो यहां मिनी पॉली हाउस तकनीक के जरिए बेमौसमी सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। ये किसान कद्दू, लौकी, खरबूजा, तरबूजा, कटहल और विदेशी किस्म की ककड़ी जैसी सब्जियों की खेती कर रहे हैं।
🌱 जैविक खाद, मिनी पॉली हाउस और ड्रिप सिंचाई का सफल प्रयोग
खेती की इस आधुनिक पद्धति में जैविक खाद से ऊंचे धोरे (मेड़) तैयार किए जाते हैं। इन धोरों पर मिनी पॉली हाउस स्थापित कर बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति (ड्रिप इरिगेशन) का उपयोग किया जाता है। इससे पानी की बचत होती है और फसलों को आवश्यक नमी लगातार मिलती रहती है।
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के बिसलपुर निवासी मकबूल अहमद अपने पूरे परिवार के साथ रिया बड़ी क्षेत्र में लगभग 50 से 55 बीघा भूमि पर ठेके (लीज) पर खेती कर रहे हैं। मकबूल अहमद बताते हैं कि इस तकनीक से कम पानी और कम समय में अच्छी गुणवत्ता वाली बेमौसमी सब्जियों का उत्पादन संभव है, जिससे लागत कम और मुनाफा अधिक होता है।

🚜 खेती की पूरी प्रक्रिया और लागत
मकबूल अहमद ने बताया कि वे जैविक खाद से बड़े-बड़े धोरे बनाकर उन पर कद्दू, लौकी, खरबूजा, तरबूजा और कटहल की रोपाई करते हैं। दो धोरों के बीच 5 से 6 फीट की दूरी रखी जाती है, ताकि बेलें फैल सकें और फसल को भरपूर जगह मिले। फसल की वृद्धि के दौरान 3 से 4 बार जैविक खाद के साथ निराई-गुड़ाई की जाती है और खरपतवारों को समय-समय पर हटाया जाता है।
इस खेती में प्रति बीघा लगभग 50 से 55 हजार रुपये का खर्च आता है। हालांकि कभी-कभी बेमौसमी बारिश या बाजार में उचित भाव नहीं मिलने से नुकसान भी उठाना पड़ता है।
💰 बाजार और मुनाफा
मकबूल अहमद अपनी उपज को दिल्ली, पंजाब, श्रीनगर सहित कई बड़े शहरों में भेजते हैं। जैविक खाद से उगाए गए तरबूज और खरबूजे अपनी खास मिठास और रसीले स्वाद के कारण बाजार में अच्छी पहचान बना चुके हैं। जब बाजार में अच्छे भाव मिलते हैं, तो प्रति बीघा 70 से 75 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा भी हो जाता है।
कुल मिलाकर, लूणी नदी के बहाव से बढ़ी जल उपलब्धता और आधुनिक खेती तकनीकों के मेल ने रिया बड़ी क्षेत्र में खेती की दिशा ही बदल दी है। यह मॉडल स्थानीय किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनता जा रहा है और आने वाले समय में क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे सकता है।
