March 1, 2026
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नई दिल्ली।
पति-पत्नी के रिश्तों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति ने पत्नी की कॉल रिकॉर्डिंग उसकी जानकारी के बिना की है, तो उसे तलाक जैसे वैवाहिक विवादों में बतौर वैध साक्ष्य स्वीकार किया जा सकता है। यह निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की डबल बेंच ने सुनाया। कोर्ट ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए यह टिप्पणी की कि जब वैवाहिक संबंध इस स्तर तक गिर जाएं कि एक-दूसरे की जासूसी की जाए, तो यह साफ संकेत है कि वह रिश्ता मूल रूप से खत्म हो चुका होता है।


❖ क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 122 भले ही पति-पत्नी के बीच संवाद की गोपनीयता का अधिकार देती है, लेकिन यह गोपनीयता तब समाप्त हो जाती है जब संबंधों में विश्वास खत्म हो जाता है। ऐसे मामलों में जब कोई प्रत्यक्ष गवाह मौजूद न हो, तो तकनीकी सबूतों की अहम भूमिका होती है, और कॉल रिकॉर्डिंग उसी का हिस्सा है।

कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार (Article 21) एक महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन यदि वैवाहिक संबंध ही खत्म हो चुके हों, तो इस अधिकार की सीमाएं स्पष्ट हो जाती हैं। कॉल रिकॉर्डिंग का उपयोग तब किया जा सकता है, जब वह कानूनी प्रक्रिया में न्याय की सहायता के लिए हो।


❖ मामला क्या था?

यह मामला पंजाब के बठिंडा जिले से जुड़ा है। यहां एक पति ने तलाक की अर्जी दाखिल करते समय अपनी पत्नी की कॉल की रिकॉर्डिंग को सबूत के रूप में फैमिली कोर्ट में पेश किया था। फैमिली कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया। मगर पत्नी ने इस कदम को निजता का उल्लंघन बताते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने पति की इस कॉल रिकॉर्डिंग को अस्वीकार्य साक्ष्य मानते हुए खारिज कर दिया। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि ऐसे मामलों में न्याय की खोज पहले है, तकनीकी आपत्तियां बाद में।


❖ फैसले का बड़ा असर

यह फैसला देशभर में चल रहे ऐसे तमाम वैवाहिक मामलों पर असर डालेगा, जहां पति या पत्नी एक-दूसरे के व्यवहार का रिकॉर्ड इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रखते हैं। अब यह रिकॉर्डिंग एक मजबूत सबूत के रूप में प्रस्तुत की जा सकेगी, बशर्ते कि वह केस से जुड़ी हो और कोर्ट की प्रक्रिया में मदद करे।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक ओर जहां न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल को मान्यता देता है, वहीं दूसरी ओर यह भी संकेत देता है कि रिश्तों की बुनियाद विश्वास होती है, और यदि वह टूट चुका है, तो गोपनीयता की दलील न्याय में बाधा नहीं बन सकती।

यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक रूप से भी एक बड़ी बहस को जन्म देगा — कि वैवाहिक संबंधों में निजता की सीमा क्या होनी चाहिए, और न्याय की आवश्यकता कितनी बड़ी हो सकती है।

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