राजस्थान के नागौर जिले के रियाँ बड़ी क्षेत्र के प्रगतिशील किसान रामनिवास डांगा ने आधुनिक तकनीक को अपनाकर खेती की परंपरागत सोच को नई दिशा दी है। अजमेर में पॉली हाउस देखकर प्रेरित हुए डांगा ने अपने खेत में इसे स्थापित करने का निर्णय लिया, जो आज क्षेत्र के किसानों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुका है।

रामनिवास डांगा ने कृषि विभाग की सरकारी योजना के तहत पॉली हाउस लगाने के लिए आवेदन किया। कुछ महीनों की प्रक्रिया के बाद विभाग से अनुमति मिली और निर्धारित सरकारी शुल्क जमा करने के उपरांत उन्होंने अपनी 2.5 बीघा भूमि पर आधुनिक पॉली हाउस का निर्माण कराया। इस परियोजना पर उन्हें लगभग 11 लाख रुपये स्वयं खर्च करने पड़े, जबकि शेष राशि सरकारी अनुदान के रूप में प्रदान की गई। कुल मिलाकर पॉली हाउस की लागत करीब 45 लाख रुपये रही, जिसमें से अनुदान की राशि सीधे कृषि विभाग द्वारा पॉली हाउस लगाने वाली कंपनी को दी जाती है।
डांगा ने बताया कि उन्होंने पिछले वर्ष पॉली हाउस में खीरे की खेती से शुरुआत की। इस खेती में बूंद-बूंद सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) पद्धति का उपयोग किया जाता है, जो पानी की बचत के साथ-साथ फसल को आवश्यक मात्रा में नमी प्रदान करती है। इस पद्धति के अंतर्गत प्रतिदिन 10 से 20 मिनट तक प्रत्येक लाइन में पानी दिया जाता है, जिससे पौधों की बढ़वार बेहतर होती है और उत्पादन में निरंतरता बनी रहती है।
खीरे की खेती में 45 से 50 दिनों के भीतर तुड़ाई शुरू हो जाती है और यह प्रक्रिया लगभग 120 से 130 दिनों तक चलती है। इस दौरान प्रतिदिन औसतन 1000 से 1200 किलोग्राम खीरे की उपज प्राप्त होती है, जो बाजार में अच्छी कीमत दिलाने में सहायक होती है। पॉली हाउस में नियंत्रित वातावरण के कारण उत्पादन की गुणवत्ता भी सामान्य खेती की तुलना में कहीं बेहतर रहती है।
अत्यधिक गर्मी के समय पॉली हाउस के ऊपर लगे फॉगर (मिनी फव्वारे) चालू कर दिए जाते हैं, जिससे अंदर का तापमान नियंत्रित रहता है। यदि गर्मी अधिक बढ़ जाए और फसल को नुकसान की आशंका हो, तो पॉली हाउस के अंदर लगे फॉगर भी सक्रिय कर दिए जाते हैं। इससे तापमान सामान्य बना रहता है और फसल सुरक्षित रहती है। यही फॉगर कीटनाशक दवाइयों के छिड़काव के लिए भी उपयोग किए जाते हैं, जिससे कीट एवं छोटी मक्खियां फूलों और फलों को नुकसान नहीं पहुंचा पातीं।
पॉली हाउस में खीरे के पौधों को प्लास्टिक की रस्सियों के सहारे ऊपर की ओर बढ़ाया जाता है। इस तकनीक से पौधों को पर्याप्त हवा और रोशनी मिलती है, जिससे फल की गुणवत्ता में सुधार होता है। साथ ही तुड़ाई भी आसान हो जाती है और बाजार में उच्च गुणवत्ता वाले खीरे उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
रामनिवास डांगा का कहना है कि आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग कर किसान अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं। उनका यह प्रयास न केवल क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत है, बल्कि यह साबित करता है कि आधुनिक कृषि तकनीक से खेती को लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है।
नितिन सिंह वीबीटी न्यूज/01 जनवरी 2026
