महाराष्ट्र के सातारा तालुका स्थित आरे–दरे गांव में एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। जिस घर में नवजात के स्वागत की तैयारियां चल रही थीं, उसी घर से कुछ ही घंटों बाद पिता की अंतिम यात्रा निकली। जहां नन्ही किलकारियों की गूंज होनी थी, वहां तिरंगे में लिपटी खामोशी छा गई।
भारतीय सेना के जवान प्रमोद जाधव को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। सम्मान, सलामी और राष्ट्रध्वज के बीच जो दर्द और शून्य था, उसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं। यह विदाई केवल एक सैनिक की नहीं थी, बल्कि एक बेटे, पति और होने वाले पिता के अधूरे सपनों की भी थी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रमोद जाधव छुट्टी पर घर आए हुए थे। उनकी पत्नी गर्भवती थीं और परिवार में जल्द ही खुशियों की सौगात आने वाली थी। महीनों बाद घर लौटे प्रमोद के चेहरे पर सुकून और अपनापन झलक रहा था। वर्दी से बाहर वे एक जिम्मेदार पति, आज्ञाकारी बेटे और जल्द ही पिता बनने वाले इंसान थे। लेकिन किसे पता था कि किस्मत इतनी बेरहम साबित होगी।
एक सड़क दुर्घटना ने पल भर में प्रमोद जाधव की जिंदगी छीन ली। हादसे की खबर जैसे ही गांव पहुंची, किसी को यकीन नहीं हुआ। लोग उम्मीद लगाए बैठे थे कि शायद खबर गलत हो, लेकिन जब सेना की गाड़ी गांव में दाखिल हुई, तो सच्चाई सबके सामने थी। खुशियों से भरा घर पल भर में मातम में बदल गया। मां बेसुध हो गईं, पिता की आंखों में अंधेरा छा गया और पत्नी, जो कुछ ही घंटों में मां बनने वाली थीं, एक पल में विधवा हो गईं।
इस दर्दनाक घटना के कुछ ही घंटों बाद अस्पताल में प्रमोद की पत्नी ने एक बेटी को जन्म दिया। एक तरफ जीवन की पहली सांस थी, दूसरी तरफ मौत की खामोशी। जिस पल को परिवार के लिए सबसे सुखद होना चाहिए था, वही पल असहनीय पीड़ा लेकर आया। प्रमोद पिता तो बन गए, लेकिन अपनी बेटी का चेहरा देखे बिना ही इस दुनिया से विदा हो गए।
अंतिम संस्कार के दिन आरे–दरे गांव में सन्नाटा पसरा रहा। तिरंगे में लिपटा प्रमोद जाधव का पार्थिव शरीर जब गांव पहुंचा, तो हर आंख भर आई। सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया, जब अस्पताल से स्ट्रेचर पर प्रमोद की पत्नी अपने पति के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचीं। वही पति, जिसके साथ उन्होंने पूरी जिंदगी के सपने संजोए थे, आज खामोशी से तिरंगे के नीचे लेटा था।
सिर्फ आठ घंटे पहले जन्मी नवजात बच्ची को भी उसके पिता के अंतिम दर्शन के लिए लाया गया। नन्ही-सी देह, बंद मुट्ठियां और सामने तिरंगे में लिपटा उसका पिता—यह दृश्य पत्थर दिल को भी रुला देने वाला था। बच्ची को शायद एहसास नहीं था कि उसने क्या खो दिया है, लेकिन वहां मौजूद हर शख्स जानता था कि यह खालीपन कभी नहीं भर पाएगा।
यह घटना केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि समाज के लिए भी एक गहरी टीस है—जहां एक ओर नया जीवन जन्म लेता है, वहीं दूसरी ओर कर्तव्य निभाते हुए एक जिंदगी असमय खत्म हो जाती है।
नितिन सिंह/ वीबीटी न्यूज| 12 जनवरी 2026
