काबुल ।अफ़ग़ानिस्तान एक बार फिर से पूरी दुनिया की सुर्खियों में है। तालिबान शासन ने अचानक इंटरनेट और टेलिकॉम सेवाओं पर पूरी तरह से रोक लगाकर संचार व्यवस्था को ठप कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था नेटब्लॉक्स (NetBlocks) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में पुष्टि की है कि इस समय अफगानिस्तान में कनेक्टिविटी पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और इसे “पूर्ण कनेक्टिविटी ब्लैकआउट” की स्थिति बताया जा रहा है।
इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क दोनों बंद
कुछ सप्ताह पहले ही तालिबान ने “अनैतिकता रोकने” के नाम पर फाइबर-ऑप्टिक इंटरनेट कनेक्शनों की कटौती शुरू की थी। अब स्थिति यह है कि न केवल मोबाइल इंटरनेट, बल्कि मोबाइल फोन नेटवर्क, यहां तक कि सैटेलाइट टीवी सेवाएं भी बाधित कर दी गई हैं। कई स्थानीय मीडिया हाउस ने शिकायत की है कि वे राजधानी काबुल स्थित अपने दफ्तरों से भी संपर्क खो चुके हैं।
फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क दुनिया भर की इंटरनेट संरचना की रीढ़ माना जाता है। इसकी कटौती से अफगानिस्तान लगभग पूरी तरह बाहरी दुनिया से कट चुका है। देश में रहने वाले आम नागरिकों को अब न तो अपने परिवारों से संपर्क करने की सुविधा है और न ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कोई जुड़ाव।
डिजिटल अधिकारों पर गंभीर खतरा
डिजिटल अधिकार समूहों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि इंटरनेट बंद करना केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला नहीं है, बल्कि यह देश की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, व्यापार और आपदा प्रबंधन जैसे बुनियादी क्षेत्रों पर भी गहरा असर डालेगा।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे अफगान जनता पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाएगी और उनकी आवाज़ दुनिया तक नहीं पहुंच पाएगी।
सोशल मीडिया पर फैला डर और निराशा
हालांकि इंटरनेट बंद होने से पहले कुछ अफगान नागरिकों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए अपनी व्यथा साझा की थी। लोगों का कहना है कि “पूरा देश अकेलेपन में डूब गया है” और तालिबान शासन ने अफगानिस्तान को उत्तर कोरिया से भी आगे इंटरनेट कटऑफ़ में पहुंचा दिया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रही संस्थाओं ने भी चिंता जताई है कि इस तरह की नीति से अफगानिस्तान में मानवीय संकट और गहराएगा।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता
पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि तालिबान धीरे-धीरे देश को बाहरी दुनिया से काटने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। इंटरनेट और टेलिकॉम सेवाओं की पूर्ण बंदी ने इन आशंकाओं को सही साबित कर दिया है।
रिपोर्टों के अनुसार, विदेशी मीडिया हाउस और अंतरराष्ट्रीय एनजीओ को अब अफगानिस्तान में काम करने में बड़ी मुश्किलें आ रही हैं। वे न तो अपने स्थानीय कर्मचारियों से संपर्क कर पा रहे हैं और न ही जमीनी स्तर की जानकारी जुटा पा रहे हैं।
भविष्य को लेकर अनिश्चितता
तालिबान की इस कार्रवाई के बाद अफगान जनता के बीच भविष्य को लेकर गंभीर असुरक्षा और भय का माहौल है। कई नागरिकों का मानना है कि अब देश पूरी तरह से सूचनात्मक अंधकार (Information Blackout) की ओर बढ़ चुका है।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो अफगानिस्तान की नई पीढ़ी शिक्षा और रोजगार के अवसरों से वंचित रह जाएगी और देश का विकास पूरी तरह रुक जाएगा।
तालिबान शासन का यह कदम स्पष्ट करता है कि वह न केवल राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर नियंत्रण करना चाहता है, बल्कि लोगों की सूचना तक पहुंच पर भी पूरी तरह से लगाम लगाना चाहता है। इंटरनेट और टेलिकॉम सेवाओं की बंदी ने अफगानिस्तान को लगभग एक सूचना कारागार बना दिया है।
अब देखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस गंभीर कदम पर क्या प्रतिक्रिया देता है और अफगानिस्तान की आम जनता को इस संचार संकट से बाहर निकालने के लिए क्या ठोस प्रयास किए जाते हैं।
