January 15, 2026
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राजस्थान के नागौर जिले के थांवला में सांस्कृतिक धरोहरों और प्राचीन स्थापत्य कला के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, भारतीय सांस्कृतिक निधि अध्याय नागौर एवं सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन की संयुक्त विशेषज्ञ टीम ने थांवला कस्बे के दो प्रमुख ऐतिहासिक मंदिरों – भगवान श्री चारभुजानाथ मंदिर और प्राचीन शिव मंदिर – का गहन सर्वेक्षण किया। यह सर्वेक्षण रविवार देर शाम संपन्न हुआ।

सर्वेक्षण टीम में भारतीय सांस्कृतिक निधि नागौर के संयोजक हिम्मतसिंह राठौड़, सह-संयोजक नरेंद्रसिंह जसनगर, सेव ऑवर हेरिटेज फाउंडेशन के संस्थापक और संयोजक अरिहंतसिंह शेखावत के साथ विशेषज्ञ सदस्य महिपालसिंह गुड़ियाराजेंद्र मीणा और अमरसिंह गौड़ शामिल रहे। टीम ने मंदिरों की ऐतिहासिकता, स्थापत्य शैली और मूर्तिकला पर गहन शोधपरक अवलोकन किया।

विशेषज्ञों ने भगवान श्री चारभुजानाथ मंदिर की पारंपरिक निर्माण तकनीकों, स्तंभों की शैली और गर्भगृह की बनावट पर विशेष ध्यान दिया। वहीं, बस स्टेशन के पास स्थित प्राचीन शिव मंदिर का अध्ययन करते समय टीम ने उसकी दीवारों, गुंबद, द्वारशिल्प और मंदिर परिसर में फैले प्राचीन पत्थर खंडों का निरीक्षण किया।


इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता रोहिताशसिंह थांवला ने टीम को शिव मंदिर के पूर्व जीर्णोद्धार कार्यों, मंदिर की सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक महत्व से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं।

शिव मंदिर के परिसर में मौजूद चौहान वंशकालीन (10वीं से 14वीं सदी) शिलालेखों को देखकर विशेषज्ञों ने गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने इन शिलालेखों को थांवला के ऐतिहासिक गौरव का प्रमाण बताते हुए इनके संरक्षण की जरूरत पर बल दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि ये शिलालेख उस काल की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं की झलक प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें यदि संरक्षित किया जाए, तो भविष्य की पीढ़ियाँ समृद्ध ऐतिहासिक जानकारी से लाभान्वित हो सकती हैं।

सर्वेक्षण दल ने इस बात पर चिंता जताई कि आधुनिकता की दौड़ में कई प्राचीन धार्मिक स्थल उपेक्षित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि चारभुजानाथ मंदिर और शिव मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र हैं, बल्कि वास्तुकला, मूर्तिकला और पुरातत्व की दृष्टि से भी अपार मूल्य रखते हैं। इनके संरक्षण और संवर्धन की तत्काल आवश्यकता है।

टीम ने स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से आग्रह किया कि इन ऐतिहासिक धरोहरों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए, ताकि सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर पहचान मिल सके। साथ ही, ग्रामीणों और युवाओं को भी इन स्थलों के संरक्षण में भागीदार बनने की प्रेरणा दी गई।

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