April 5, 2026
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राजस्थान / कहते हैं कि हौसलों के तरकश में अगर मेहनत का तीर हो, तो कोई भी लक्ष्य नामुमकिन नहीं। राजस्थान के नागौर जिले के छोटे से कस्बे थांवला की भार्गवी सिंह चौधरी ने इस कहावत को हकीकत में बदल दिया है। महज 13 साल की उम्र में भार्गवी ने मार्शल आर्ट्स (ताइक्वांडो) में ‘सेकंड डैन ब्लैक बेल्ट’ हासिल कर प्रदेश का नाम ऊंचा किया है। लेकिन इस ‘गोल्डन गर्ल’ की चमक के पीछे व्यवस्थाओं का वह अंधेरा है, जो हमारी खेल नीति पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

 *रिकॉर्ड्स की झड़ी, पर सुविधाओं का अकाल* 

 

भार्गवी की कहानी किसी अजूबे से कम नहीं है। उन्होंने मात्र 4.5 साल की उम्र में पहली बार ब्लैक बेल्ट हासिल कर राजस्थान में एक कीर्तिमान स्थापित कर अपना नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करवाया था। आज उनके खाते में विभिन्न स्कूल , ओपन और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताएं खेलते हुए 29 स्वर्ण पदक जीत उनके खाते में हैं, जो उनकी अद्भुत प्रतिभा और कड़ी मेहनत का प्रमाण हैं। हाल ही में हासिल की गई ‘सेकंड डैन ब्लैक बेल्ट’ उनकी विशेषज्ञता और परिपक्वता को दर्शाती है।

 

 *35 किमी का सफर और पिता का त्याग* 

एक खिलाड़ी की सफलता में उसकी ट्रेनिंग की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन भार्गवी के लिए यह डगर कांटों भरी है। थांवला में आधुनिक खेल सुविधाओं का नामोनिशान नहीं है। ऐसे में अपनी तकनीक को निखारने के लिए भार्गवी को रोजाना 35 किलोमीटर दूर अजमेर जाना पड़ता है। उनके पिता, दीपक सिंह (एक निजी स्कूल में शिक्षक हैं), अपनी सीमित आय और संसाधनों के बावजूद हर दिन बेटी को बाइक से लेकर कोचिंग जाते हैं। यह 70 किमी का आना-जाना न केवल आर्थिक बोझ बढ़ाता है, बल्कि एक उभरते खिलाड़ी की शारीरिक ऊर्जा को भी निचोड़ देता है।

 *अनदेखी के बीच सुलगते सवाल* 

29 गोल्ड मेडल जीतने के बावजूद भार्गवी का संघर्ष कम होने का नाम नहीं ले रहा है:

बुनियादी ढांचा: थांवला में आज भी ताइक्वांडो मैट और जरूरी उपकरणों का अभाव है।

 *भार्गवी के पिता दीपक का कहना* 

इतने बड़े मुकाम के बाद भी भार्गवी को अब तक कोई स्कॉलरशिप या सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिला है।

29 गोल्ड मेडल जीते, पर सिस्टम ने दिया ‘शून्य’: नागौर की ‘गोल्डन गर्ल’ के पास सेकंड डैन ब्लैक बेल्ट तो है, पर अपनी मिट्टी पर मैट नहीं!डाइट, किट और टूर्नामेंट में जाने का पूरा खर्च पिता के कंधों पर है। “मेरी बेटी का सपना देश के लिए ओलंपिक पदक लाना है, लेकिन बिना सरकारी सहयोग और स्थानीय सुविधाओं के यह सफर बहुत कठिन है। हम अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं, पर सिस्टम की अनदेखी अखरती है।”

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