April 29, 2026
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जयपुर/क्योंझर। देश को झकझोर देने वाली एक घटना ओडिशा के क्योंझर जिले से सामने आई है, जहां एक गरीब आदिवासी युवक को अपनी ही बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचना पड़ा। यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करती है, बल्कि सिस्टम की कठोरता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। अब इस मामले में राजस्थान के कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा ने मानवीय पहल करते हुए पीड़ित की मदद के लिए अपनी एक महीने की सैलरी देने की घोषणा की है।

दरअसल, आदिवासी युवक जीतू मुंडा अपनी बहन कलारा मुंडा के बैंक खाते से 20 हजार रुपये निकालना चाहता था। उसकी बहन की मृत्यु 26 जनवरी 2026 को हो चुकी थी, लेकिन बैंक कर्मचारियों ने खाताधारक को स्वयं उपस्थित करने की शर्त रख दी। जीतू ने कई बार बताया कि उसकी बहन अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब जीतू को किसी तरह की मदद नहीं मिली और उसे बैंक के नियम-कायदों की जानकारी भी नहीं थी, तो उसने एक बेहद दर्दनाक कदम उठाया। वह अपनी बहन का कंकाल कब्र से निकालकर बैंक ले आया, ताकि यह साबित कर सके कि उसकी बहन की मृत्यु हो चुकी है। करीब तीन किलोमीटर तक कंधे पर कंकाल लेकर चलने वाला यह दृश्य इंसानियत को झकझोर देने वाला था।

बताया जा रहा है कि कलारा मुंडा के खाते में उसके पति और बेटे को नॉमिनी बनाया गया था, लेकिन दोनों की पहले ही मौत हो चुकी थी। ऐसे में जीतू, निकटतम रिश्तेदार होने के नाते उस राशि का हकदार था। बावजूद इसके, उसे नियमों की जटिलता और कर्मचारियों की बेरुखी का सामना करना पड़ा।

इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए राजस्थान के कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने लिखा, “जीतू मुंडा की बेबसी और पीड़ा देखकर कलेजा कांप उठा। एक गरीब आदिवासी के साथ कागजी खानापूर्ति के नाम पर इस तरह की प्रताड़ना किसी भी समाज के लिए कलंक है।”

उन्होंने आगे कहा कि “जीतू का दर्द मेरा दर्द है। संकट की इस घड़ी में उसके साथ खड़ा रहना मेरा कर्तव्य है। मैं अपनी एक महीने की सैलरी उसके परिवार को दूंगा।” साथ ही उन्होंने ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहनचरण माझी से इस मामले में कार्रवाई की मांग भी की।

यह घटना देश में बैंकिंग व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जमीनी हकीकत को उजागर करती है, जहां एक अशिक्षित व्यक्ति को अपने हक के लिए इस हद तक जाना पड़ा। यह सवाल भी उठता है कि क्या नियमों का पालन करते-करते हम मानवीय संवेदनाओं को भूलते जा रहे हैं?

जीतू मुंडा की यह दर्दनाक कहानी सिस्टम को आईना दिखाती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर कब तक गरीब और कमजोर वर्ग ऐसे ही परेशान होते रहेंगे।

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