इस्लामाबाद | 28 अप्रैल 2026
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के शतरंज पर पाकिस्तान ने एक ऐसी चाल चली है जिसने वाशिंगटन से लेकर तेहरान तक हलचल मचा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य और कूटनीतिक तनाव के बीच, पाकिस्तान ने अपनी नई व्यापारिक नीति के जरिए ईरान को एक बड़ी आर्थिक संजीवनी देने का फैसला किया है।
पाकिस्तान द्वारा तैयार किया गया यह नया कानूनी और व्यापारिक ढांचा न केवल ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के असर को कम कर सकता है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में पाकिस्तान की भूमिका को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।
क्या है ‘ट्रांजिट ऑफ गुड्स ऑर्डर 2026’?
पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर “ट्रांजिट ऑफ गुड्स थ्रू टेरिटरी ऑफ पाकिस्तान ऑर्डर 2026” लागू कर दिया है। यह कोई साधारण व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक बाईपास है।
इस नीति की मुख्य विशेषताएं:
समुद्री नाकेबंदी का समाधान: यदि भविष्य में अमेरिका ईरान की समुद्री घेराबंदी करता है, तो भी ईरान तक सामान की आपूर्ति नहीं रुकेगी।
तीसरे देशों का रूट: दुनिया के किसी भी हिस्से से आने वाला माल पहले पाकिस्तान के बंदरगाहों पर उतरेगा और वहां से सड़क मार्ग के जरिए ईरान भेजा जाएगा।
6 रणनीतिक कॉरिडोर: पाकिस्तान ने इसके लिए छह विशेष ट्रांजिट कॉरिडोर तय किए हैं, जिनमें ग्वादर, कराची, क्वेटा, तुर्बत और ताफ्तान जैसे महत्वपूर्ण सीमावर्ती बिंदु शामिल हैं।
3,000 फंसे हुए कंटेनरों को मिली हरी झंडी
इस नीति का तत्काल असर कराची बंदरगाह पर देखने को मिला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी दबाव और तकनीकी जटिलताओं के कारण पिछले काफी समय से करीब 3,000 कंटेनर कराची में फंसे हुए थे, जिन्हें ईरान भेजा जाना था। नए ट्रांजिट ढांचे के लागू होते ही इन कंटेनरों की आवाजाही का रास्ता साफ हो गया है। यह ईरान की चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी राहत है।
एक तरफ ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी’, दूसरी तरफ पाकिस्तान का ‘ब्रिज’
पाकिस्तान का यह कदम ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ने ईरान पर नकेल कसने के लिए “ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी” की शुरुआत की है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने हाल ही में 14 प्रभावशाली व्यक्तियों और संस्थाओं पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं ताकि ईरान को वैश्विक बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली से पूरी तरह काटा जा सके।
ऐसे में पाकिस्तान द्वारा ईरान को जमीनी रास्ता देना सीधे तौर पर अमेरिकी रणनीति को चुनौती देने जैसा माना जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तान का आधिकारिक रुख यह है कि वह केवल क्षेत्रीय कनेक्टिविटी (Regional Connectivity) और व्यापार को बढ़ावा दे रहा है, न कि किसी देश के खिलाफ सैन्य या रणनीतिक मोर्चा खोल रहा है।
पाकिस्तान की दोहरी भूमिका: मध्यस्थ या रणनीतिकार?
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक पाकिस्तान की इस भूमिका को बहुत बारीकी से देख रहे हैं। पाकिस्तान वर्तमान में दो नावों पर सवार दिखने की कोशिश कर रहा है:
मध्यस्थ: पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने वाले एक शांतिदूत के रूप में पेश कर रहा है।
व्यापारिक साझेदार: साथ ही, वह अपनी भौगोलिक स्थिति (Geographical Location) का फायदा उठाकर ईरान के व्यापार का मुख्य केंद्र बनना चाहता है।
क्या बढ़ेंगी मुश्किलें?
आलोचकों और कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ‘दोधारी तलवार’ साबित हो सकता है। जहाँ एक ओर इससे पाकिस्तान को ट्रांजिट फीस के रूप में आर्थिक लाभ होगा और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ेगा, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ उसके संबंधों में खटास आ सकती है। यदि अमेरिका इसे प्रतिबंधों का उल्लंघन मानता है, तो पाकिस्तान को भी कड़े कूटनीतिक परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।
