संवाददाता/नितिन सिंह
राजस्थान की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में पिता के निधन के बाद परिवार के बड़े बेटे को उत्तराधिकारी घोषित कर ‘पाग दस्तूर’ की रस्म निभाई जाती है। यदि पुत्र नहीं हो तो कई परिवारों में निकट संबंधी को दत्तक लेकर यह परंपरा पूरी की जाती है। लेकिन नागौर जिले की रियांबड़ी पंचायत समिति के सुरियास गांव में इस परंपरा को नई सोच और नई दिशा देते हुए पहली बार परिवार की इकलौती बेटी का पाग दस्तूर कर उसे परिवार की विरासत का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
सुरियास निवासी कानसिंह राठौड़ का 15 जुलाई को गंभीर बीमारी के बाद निधन हो गया था। उनके परिवार में पत्नी और 10 वर्षीय इकलौती पुत्री भाविका कंवर (बिट्टू) हैं। रविवार को बारहवें की रस्म के बाद परंपरा के अनुसार उत्तराधिकारी तय करने को लेकर चर्चा हुई। इस दौरान निकट संबंधी को दत्तक लेकर पाग दस्तूर कराने का प्रस्ताव सामने आया, लेकिन परिवार की महिलाओं ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया।
कानसिंह की माता और पत्नी ने स्पष्ट कहा कि बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं है। जब परिवार में बेटी मौजूद है तो दत्तक पुत्र लेने की आवश्यकता नहीं है। परिवार के इस निर्णय का पीहर और ससुराल पक्ष सहित सभी परिजनों ने समर्थन किया और सर्वसम्मति से भाविका कंवर का पाग दस्तूर करने का फैसला लिया।रस्म के दौरान सबसे पहले भाविका की दादी के पीहर पक्ष से शंकरसिंह राजावत ने उसे पगड़ी पहनाई। इसके बाद ननिहाल पक्ष से महावीरसिंह सिंगोद ने दूसरी पगड़ी बांधकर पाग दस्तूर की परंपरा पूर्ण कराई। इस भावुक और ऐतिहासिक अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं समाज के गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
परिवार के वरिष्ठ सदस्य महावीर सिंह ने बताया कि उनके परिवार में पिछले चार पीढ़ियों से प्रत्येक पीढ़ी में केवल एक ही पुत्र हुआ। पड़दादा भीमसिंह, उनके पुत्र उदयसिंह, फिर भगवानसिंह और उसके बाद कानसिंह—हर पीढ़ी में परिवार का एकमात्र बेटा था। अब कानसिंह के निधन के बाद उनकी इकलौती पुत्री भाविका कंवर को परिवार की विरासत और जिम्मेदारियां सौंपकर नई परंपरा की शुरुआत की गई है।

ग्रामीणों ने इस निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि यह कदम बेटियों को समान अधिकार और सम्मान देने का प्रेरणादायी संदेश है। उपस्थित लोगों का मानना है कि सुरियास गांव का यह फैसला समाज में सकारात्मक बदलाव की मिसाल बनेगा और बेटियों के प्रति समानता की सोच को और मजबूत करेगा। इस अवसर पर कुन्दनसिंह, छोटूसिंह, हड़मानसिंह, गिरवरसिंह, किशोरसिंह, महावीरसिंह, रुघनाथसिंह, गोपालसिंह, रतनसिंह, भंवरसिंह, रविन्द्रसिंह, दशरथसिंह, विक्रमसिंह और श्यामसिंह सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
