पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 अब अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। राज्य की शेष 142 सीटों के लिए 29 अप्रैल को दूसरे और अंतिम चरण का मतदान होना है। ऐसे में चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने एक ऐसा राजनीतिक दांव चला है, जिसने चुनावी माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। कोलकाता के ऐतिहासिक Thanthania Kalibari और उत्तर 24 परगना स्थित Matua Thakurbari में उनकी मौजूदगी ने ‘टेंपल पॉलिटिक्स’ को केंद्र में ला दिया है।
थंथनिया कालीबाड़ी: परंपरा के जरिए राजनीति का संदेश
करीब 300 साल पुराने थंथनिया कालीबाड़ी मंदिर में पीएम मोदी का जाना केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक सटीक राजनीतिक संकेत भी था। यह मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहां मां काली को मछली और मांस का प्रसाद चढ़ाया जाता है। हाल ही में मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और टीएमसी ने बीजेपी पर आरोप लगाया था कि वह बंगाल की खान-पान संस्कृति में दखल दे सकती है। पीएम मोदी ने मंदिर में पूजा कर इस आरोप को सीधे तौर पर चुनौती दी और यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी पार्टी स्थानीय परंपराओं का सम्मान करती है।
मतुआ ठाकुरबाड़ी: 50 सीटों का समीकरण और CAA का असर
पीएम मोदी का दूसरा बड़ा पड़ाव ठाकुरनगर का मतुआ ठाकुरबाड़ी रहा, जो मतुआ समुदाय का प्रमुख आस्था केंद्र है। यह समुदाय बंगाल की करीब 50 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। यहां पहुंचकर पीएम ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भरोसा दिलाया कि यह कानून शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए है, न कि किसी की नागरिकता छीनने के लिए। बीजेपी लंबे समय से इस समुदाय को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, और चुनाव के अंतिम चरण में यह दौरा उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
टीएमसी के गढ़ में ‘स्लॉग ओवर’ की रणनीति
अंतिम चरण की 142 सीटों में कोलकाता, हावड़ा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना जैसे इलाके शामिल हैं, जिन्हें टीएमसी का मजबूत गढ़ माना जाता है। 2021 के चुनाव में इन क्षेत्रों में ममता बनर्जी को भारी बढ़त मिली थी। इस बार बीजेपी ने संदेशखाली विवाद और घुसपैठ जैसे मुद्दों को उठाकर चुनाव को ‘सुरक्षा बनाम पहचान’ के फ्रेम में लाने की कोशिश की है।
चुनाव प्रचार के अंतिम घंटों में पीएम मोदी का यह ‘कल्चरल कनेक्ट’ दांव कितना असरदार साबित होता है, यह 29 अप्रैल को मतदाताओं के फैसले से साफ होगा। अब नजरें 4 मई को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या यह रणनीति ममता बनर्जी के मजबूत किले में सेंध लगा पाती है या नहीं।
